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धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और नमाज़ के समय में बदलाव: एक गंभीर मुद्दा

धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और नमाज़ के समय में बदलाव: एक गंभीर मुद्दा

मुफ्ती मुहम्मद अताउल्लाह समीई
📍 माहदुश्शरीया अल इस्लामिया, मवाना, मेरठ, यूपी, हिंदुस्तान
🌐 www.atasamiee.in

क्या नमाज़ के समय बदले जा सकते हैं?

भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है, जहाँ हर धर्म के अनुयायियों को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा-अर्चना करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन हाल ही में कुछ घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ मुस्लिम समाज की नमाज़ के समय में बदलाव किया गया, यह कहकर कि किसी अन्य धर्म का त्योहार मनाया जा रहा है।

यह एक गंभीर विषय है, जो न केवल धार्मिक स्वतंत्रता बल्कि समानता और मौलिक अधिकारों के सिद्धांतों पर भी प्रहार करता है। सवाल यह उठता है कि क्या किसी अन्य धर्म के त्योहार की वजह से मुसलमानों के नमाज़ के समय में बदलाव किया जा सकता है?

क्या हमारे त्योहार दूसरों को परेशान करते हैं?

मुसलमान अपने त्योहार शरियत के अनुसार मनाते हैं और इस दौरान किसी को कोई परेशानी नहीं दी जाती। उदाहरण के लिए:

✅ ईद के दिन मुसलमान सामूहिक नमाज़ अदा करते हैं, लेकिन शांति बनाए रखते हैं।
✅ क़ुर्बानी के दौरान स्वच्छता और सफाई का ध्यान रखा जाता है।
✅ रमज़ान के महीने में रोज़ा रखते हैं, लेकिन किसी को जबरन रोज़ा रखने को नहीं कहा जाता।

इसके विपरीत, दीवाली में पटाखों से बीमार, बूढ़े और बच्चे प्रभावित होते हैं, कई जगहों पर आग लगने की घटनाएँ होती हैं। होली के रंगों से कई लोग असहज महसूस करते हैं, लेकिन कभी किसी ने इसे रोकने की माँग नहीं की।

अगर मुसलमान किसी के त्योहार में बाधा नहीं डालते, तो उनकी नमाज़ के समय में बदलाव क्यों?

क्या यह समानता और न्याय है?

अगर सरकार सभी धर्मों के लोगों को बराबरी का अधिकार देती है, तो:

❓ क्या हिंदुओं को यह कहा जाता है कि वे अपने त्योहार विशेष स्थानों पर मनाएँ?
❓ क्या सरकार ने कहा कि दीवाली की रात 10 बजे के बाद पटाखे न जलाए जाएँ?
❓ क्या होली में रंग खेलने के लिए सीमित स्थान तय किए गए?

अगर इन पर कोई रोक नहीं, तो मुसलमानों की जुमा की नमाज़ के समय में हस्तक्षेप क्यों?

क्या यही समानता है?

भारत की आज़ादी में मुसलमानों ने अपनी जानें दीं, अपने घर छोड़े, जेलें काटीं, ताकि सभी को बराबरी का हक़ मिले। लेकिन आज ऐसा लगता है कि उन कुर्बानियों को भुला दिया गया है। अगर मुसलमान अब भी चुप रहे, तो आगे चलकर उनके धार्मिक अधिकार और भी सीमित किए जा सकते हैं।

समाधान क्या है?

✔ मुसलमानों को एकजुट होकर इस अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिए।
✔ मुस्लिम नेतृत्व को सरकार से बात करनी चाहिए और इस फैसले को वापस लेने की कोशिश करनी चाहिए।
✔ अन्य धर्मों के न्यायप्रिय और उदार लोगों को भी इस मुद्दे से अवगत कराना चाहिए।

निष्कर्ष

आज जुमा की नमाज़ के समय को बदला गया, कल ईद की नमाज़, तरावीह और अन्य इस्लामी इबादतों को भी रोका जा सकता है। अगर आज मुसलमानों ने चुप्पी साध ली, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन जाएगी।

पता  नहीं कितने लोगों को नमाज़ का टाइम बदलने की वजह से अपने काम आगे पीछे करने पड़े होंगे

पता नहीं कितने लोगों के कामों में अड़चन आई होगी

👉 “लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई ।”

अगर मुसलमान इस अन्याय के खिलाफ़ अब आवाज़ नहीं उठाएँगे, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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